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September 11, 2016

Naina Devi Mandir Nainital (नैना देवी मंदिर नैनीताल)

Naina Devi Mandir Nainitaal (नैना देवी मंदिर नैनीताल)


Naina Devi Temple, Nainital


नैनीताल भारत के उत्तराखंड राज्य का एक प्रमुख पर्यटन नगर है। नैनीताल में मुख्य आकर्षण का केंद्र यहां की खूबसूरत झीलें हैं। यहां कई झीलें हैं, जिसके कारण इसे झीलों का शहर भी कहा जाता है। नैनी झील इनमें प्रमुख है। नैनी झील के नाम पर ही इस शहर का नाम नैनीताल पड़ा। कहते हैं यहां देवी सती के नेत्र गिरे थे। नैनीताल में नैनी झील के उत्तरी किनारे पर नैना देवी मंदिर स्थित है। आपको बता दें कि नैना देवी मंदिर का शुमार प्रमुख शक्ति पीठों के रूप में भी होता है। ज्ञात हो कि 1880 में भू-स्खलन से यह मंदिर नष्ट हो गया था। बाद में इसे दोबारा बनाया गया। यहां सती के शक्ति रूप की पूजा की जाती है। मंदिर में दो नेत्र हैं जो नैना देवी को दर्शाते हैं। नैनी झील के बारें में माना जाता है कि जब शिव सती की मृत देह को लेकर कैलाश पर्वत जा रहे थे, तब जहां-जहां उनके शरीर के अंग गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई नैनी झील के स्थान पर देवी सती के नेत्र गिरे थे। इसी से प्रेरित होकर इस मंदिर की स्थापना की गई है। मान्यता है कि यहां देवी के नयनों की अश्रुधार से एक ताल का निर्माण हुआ। तबसे निरंतर यहां पर शिवपत्नी नंदा (पार्वती)की पूजा नैनादेवी के रूप में होती है। आपको बता दें कि आज इसी ताल को नैनी झील के नाम से जाना जाता है और हर साल लाखों पर्यटक यहां घूमने आते हैं। अप्रैल से जून और फिर नवंबर से जनवरी तक इस मंदिर की यात्रा कर सकते हैं। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां मुख्य देवी नैना देवी की प्रतिमा के साथ ही भगवान श्री गणेश और काली माता की मूर्तियां भी लगाई गई हैं। साथ ही पीपल का एक विशाल वृक्ष मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित है जिसके पीछे भी कई मान्यताएं हैं।

Night View Naina Devi Temple, Nainital

Naina Devi Temple, Nainital


पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री उमा का विवाह शिव से हुआ था। शिव को दक्ष प्रजापति पसन्द नहीं करते थे, परन्तु वह देवताओं के आग्रह को टाल नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह न चाहते हुए भी शिव के साथ कर दिया था। एक बार दक्ष प्रजापति ने सभी देवताओं को अपने यहाँ यज्ञ में बुलाया, परन्तु अपने दामाद शिव और बेटी उमा को निमन्त्रण तक नहीं दिया। उमा हठ कर इस यज्ञ में पहुँची। जब उसने हरिद्वार स्थित कनरवन में अपने पिता के यज्ञ में सभी देवताओं का सम्मान और अपने पति और अपना निरादर होते हुए देखा तो वह अत्यन्त दु:खी हो गयी। यज्ञ के हवनकुण्ड में यह कहते हुए कूद पड़ी कि 'मैं अगले जन्म में भी शिव को ही अपना पति बनाऊँगी। आपने मेरा और मेरे पति का जो निरादर किया इसके प्रतिफल - स्वरुप यज्ञ के हवन - कुण्ड में स्वयं जलकर आपके यज्ञ को असफल करती हूँ।' जब शिव को यह ज्ञात हुआ कि उमा सती हो गयी, तो उनके क्रोध का पारावार न रहा। उन्होंने अपने गणों के द्वारा दक्ष प्रजापति के यज्ञ को नष्ट - भ्रष्ट कर डाला। सभी देवी - देवता शिव के इस रौद्र - रुप को देखकर सोच में पड़ गए कि शिव प्रलय न कर ड़ालें। इसलिए देवी - देवताओं ने महादेव शिव से प्रार्थना की और उनके क्रोध के शान्त किया। दक्ष प्रजापति ने भी क्षमा माँगी। शिव ने उनको भी आशीर्वाद दिया। परन्तु सती के जले हुए शरीर को देखकर उनका वैराग्य उमड़ पड़ा। उन्होंने सती के जले हुए शरीर को कन्धे पर डालकर आकाश - भ्रमण करना शुरु कर दिया। ऐसी स्थिति में जहाँ - जहाँ पर शरीर के अंग किरे, वहाँ - वहाँ पर शक्ति पीठ हो गए। जहाँ पर सती के नयन गिरे थे ; वहीं पर नैनादेवी के रुप में उमा अर्थात् नन्दा देवी का भव्य स्थान हो गया। आज का नैनीताल वही स्थान है, जहाँ पर उस देवी के नैन गिरे थे। नयनों की अश्रुधार ने यहाँ पर ताल का रुप ले लिया। तबसे निरन्तर यहाँ पर शिवपत्नी नन्दा (पार्वती) की पूजा नैनादेवी के रुप में होती है।

Naina Devi Temple, Nainital

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